1965, कारगिल और ऑपरेशन सिंदूर जैसे अभियानों से स्पष्ट होता है कि ज़मीन पर कब्ज़ा ही जीत नहीं है
युद्ध में जीत का पैमाना सिर्फ ज़मीन पर कब्ज़ा करना नहीं हो सकता, यह विचार भारत के सैन्य इतिहास के कई उदाहरणों से पुष्ट होता है। 1965 की लड़ाई में भारत ने पाकिस्तान की करीब 1,840 वर्ग किलोमीटर ज़मीन पर कब्ज़ा किया, जबकि पाकिस्तान ने भारत की करीब 540 वर्ग किलोमीटर ज़मीन पर। इसके बावजूद, ताशकंद समझौते के तहत दोनों पक्षों को 5 अगस्त 1965 की स्थिति में लौटना पड़ा, यानी जीती गई ज़मीन पर कब्ज़ा बनाए रखे बिना भी पाकिस्तान कश्मीर पर जबरन कब्ज़ा नहीं कर सकता था और भारत सैन्य कार्रवाई करके पहले की स्थिति कायम रख सकता था। अगर जीत को सिर्फ ज़मीन से मापा जाता, तो 1965 की लड़ाई को ड्रॉ कहा जाता, लेकिन भारत ने इसे अपनी जीत माना क्योंकि उसका राजनीतिक लक्ष्य पूरा हो गया था। 1999 का कारगिल युद्ध इसका एक और स्पष्ट उदाहरण है। पाकिस्तानी सेना ने एलओसी के आसपास भारतीय ठिकानों पर कब्ज़ा कर लिया था, जिसे भारत ने हर चोटी पर वापस जीत लिया। इस ऑपरेशन का मुख्य लक्ष्य कब्ज़ा छुड़ाना था, न कि किसी नए इलाके पर कब्ज़ा करना। भारत ने एलओसी को पार न करने का फैसला किया और एक इंच ज़मीन भी हासिल नहीं की, फिर भी अपनी जीत दर्ज की। इस जीत में काफी खून-पसीना बहा, पर यह एक सफल सैन्य अभियान था क्योंकि राजनीतिक लक्ष्य हासिल हुआ। मई 2025 में ऑपरेशन सिंदूर ने इस अंतर को और भी साफ कर दिया। इस ऑपरेशन में घोषित लक्ष्य ज़मीन पर कब्ज़ा करना नहीं, बल्कि आतंकी ढांचे को निशाना बनाना था। चार दिन चली इस टक्कर में लंबी दूरी की मिसाइलों, ड्रोनों और इलेक्ट्रॉनिक युद्ध जैसे आधुनिक हथियारों का इस्तेमाल हुआ, लेकिन भारत की किसी ज़मीनी सेना ने सीमा पार करके पाकिस्तानी ज़मीन पर कब्ज़ा नहीं किया। युद्धविराम तब हुआ जब भारत ने कहा कि उसके सैन्य लक्ष्य पूरे हो गए हैं। इस ऑपरेशन में किसी ज़मीन पर कब्ज़ा नहीं किया गया, इसलिए इसे जीत घोषित न करना बिल्कुल अनुचित होगा। जीत के लिए ज़मीन को ही कसौटी मानने वाले विचार के समर्थन में अक्सर 1971 की लड़ाई का उदाहरण दिया जाता है। उस लड़ाई की सबसे बड़ी उपलब्धि एक नए देश, बांग्लादेश का जन्म था। पाकिस्तान का पूर्वी हिस्सा अलग हो गया और शरणार्थी लौट गए।




