वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) संग्रह में पिछले वर्ष की तुलना में उल्लेखनीय वृद्धि ने भारतीय अर्थव्यवस्था के मजबूत स्वास्थ्य का संकेत दिया है। अक्टूबर 2025 से जुलाई 2026 के बीच दर्ज की गई कर-योग्य आपूर्ति के मूल्य में 25.8 प्रतिशत की वृद्धि, कर दरों की सुव्यवस्थित संरचना के साथ-साथ आर्थिक गतिविधियों के व्यापक विस्तार को दर्शाती है। यह सुधार, जिसका उद्देश्य उद्यमों और सार्वजनिक वित्त दोनों को मजबूत करना है, हालिया राजस्व आंकड़ों में स्पष्ट रूप से परिलक्षित होता है। अप्रैल-सितंबर 2026 की अवधि के दौरान सकल जीएसटी संग्रह 12.46 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया, जो पिछले वर्ष की समान अवधि की तुलना में 11.6 प्रतिशत अधिक है। जून से सितंबर तक के प्रत्येक महीने में वार्षिक आधार पर दोहरे अंकों की वृद्धि दर्ज की गई, और इन चार महीनों का कुल संग्रह लगभग 15 प्रतिशत की दर से बढ़ा। कर वापसी (रिफंड) के बाद भी, शुद्ध संग्रह में इस छमाही के दौरान 10.4 प्रतिशत की वृद्धि हुई, जो दर्शाता है कि करदाताओं को राहत देने और विकास के लिए उपलब्ध संसाधनों में वृद्धि साथ-साथ हुई है। इस विस्तार का दायरा उतना ही महत्वपूर्ण है जितना कि इसका पैमाना। सभी 11 क्षेत्रक समूहों और सभी प्रमुख राज्यों में कर-योग्य आपूर्ति में वृद्धि देखी गई है। भारत जैसी विविध अर्थव्यवस्था में यह व्यापक प्रसार अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह विभिन्न क्षेत्रों और भौगोलिक हिस्सों में हो रही वृद्धि अधिक से अधिक व्यवसायों को बढ़ते बाजारों में भाग लेने का अवसर देती है। परिणामस्वरूप, उत्पन्न मांग, निवेश और रोजगार से अधिकाधिक समुदायों को लाभान्वित किया जा रहा है। जब कर राहत का प्रभाव सीधे कीमतों में दिखाई देता है, तो परिवारों के पास अन्य आवश्यकताओं को पूरा करने या बचत करने के लिए अधिक गुंजाइश होती है। उपभोक्ता राहत और उद्यम विकास आपस में गहराई से जुड़े हुए हैं। परिवारों की क्रय शक्ति व्यवसायों द्वारा प्रदान की जाने वाली वस्तुओं और सेवाओं की मांग को बनाए रखती है, जिसका लाभ परिवार से लेकर खुदरा विक्रेता, आपूर्तिकर्ता और उत्पादक तक पहुंचता है। इस व्यवस्था में सहभागिता अत्यंत व्यापक रही है। अगस्त के अंत तक, केंद्र और राज्य क्षेत्राधिकारों के तहत कुल जीएसटी पंजीकरण लगभग 1.71 करोड़ तक पहुंच गए, जो एक वर्ष पहले की तुलना में लगभग 15 प्रतिशत अधिक है। यह वृद्धि जीएसटी प्रणाली में बढ़ते विश्वास और भागीदारी को दर्शाती है। इनपुट टैक्स क्रेडिट (आईटीसी) की कार्यप्रणाली इस अनुभव का एक अन्य महत्वपूर्ण हिस्सा है। सुधार-उपरांत आंकड़े बताते हैं कि आईटीसी के माध्यम से चुकाई गई कर देयता का अनुपात बढ़ा है, जबकि कर-योग्य आपूर्ति के सापेक्ष संचित क्रेडिट में कमी आई है। यह उन व्यवसायों के लिए उत्साहवर्धक है जो पात्र क्रेडिट के प्रभावी उपयोग पर निर्भर करते हैं। किसी छोटे उद्यम के लिए उसकी कार्यशील पूंजी ही यह तय करती है कि वह कितनी सुगमता से कच्चा माल खरीद सकता है, कोई आर्डर पूरा कर सकता है और अगला काम हाथ में ले सकता है। इस संदर्भ में, कर वापसी (रिफंड) भी उतनी ही प्रासंगिक है। अप्रैल-सितंबर के दौरान लगभग 1.80 लाख करोड़ रुपये की धनराशि रिफंड के रूप में लौटाई गई, जिससे व्यवसायों को अपनी तरलता बनाए रखने में मदद मिली। राज्यों की राजस्व स्थिति भी इस दौरान काफी सुदृढ़ हुई है। इस वर्ष अप्रैल-सितंबर के दौरान एकीकृत वस्तु एवं सेवा कर (आइजीएसटी) निपटान में उनके हिस्से सहित राज्यों की कुल एसजीएसटी प्राप्तियों में लगभग 16 प्रतिशत की वृद्धि हुई। यह वृद्धि राज्यों को अपने विकास और कल्याणकारी योजनाओं के लिए अधिक संसाधन उपलब्ध कराती है। सात अक्टूबर को जीएसटी परिषद के समक्ष रखे जाने वाले प्रस्ताव राज्यों के साथ निरंतर विचार-विमर्श और समन्वय से तैयार किए गए हैं। ये प्रस्ताव अनुपालन में लगने वाले समय और लागत को कम करने के उद्देश्य से पंजीकरण, रिटर्न, रिफंड, विवादों के निपटारे और इनपुट टैक्स क्रेडिट के सुगम प्रवाह से संबंधित हैं। करदाताओं का अनुभव ही इसके क्रियान्वयन का मुख्य मार्गदर्शक बना रहना चाहिए। जीएसटी की परिपक्वता के दायरे का विस्तार हमें सुधारों के अगले चरण के लिए एक सशक्त आधार प्रदान करता है। एक भरोसेमंद कर प्रणाली उद्यमों को अपने तात्कालिक दायित्वों से आगे बढ़कर योजना बनाने तथा ऐसे अवसरों में निवेश करने में सक्षम बनाती है जिनके फलने-फूलने में समय लगता है। यह 'विकसित भारत' की आर्थिक शक्ति के निर्माण में सहायक सिद्ध होता है। जीएसटी की बढ़ती परिपक्वता हमें सुधारों के अगले चरण के लिए एक सशक्त आधार प्रदान करती है। 'नेक्स्ट-जेनरेशन जीएसटी' का लक्ष्य कर दरें कम करना और अनुपालन सरल बनाना है। वर्ष 2017 में जीएसटी लागू होने से अप्रत्यक्ष कराधान के लिए एक साझा राष्ट्रीय ढांचा स्थापित हुआ। 'नेक्स्ट-जेनरेशन का जीएसटी' नौ वर्षों के क्रियान्वयन तथा करदाताओं और राज्यों के अनुभवों के आधार पर इसी प्रयास को आगे बढ़ाता है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के दृष्टिकोण के अनुरूप, नेक्स्ट-जेनरेशन जीएसटी की परिकल्पना दो परस्पर जुड़े उद्देश्यों के साथ की गई थी: कर दरों को कम एवं तर्कसंगत बनाना और अनुपालन को अधिक सरल बनाना। दरों में किए गए संशोधन 22 सितंबर, 2025 से प्रभावी हुए। प्रक्रियात्मक सुधारों का अगला चरण शीघ्र ही जीएसटी परिषद के समक्ष प्रस्तुत किया जाएगा। सम्मिलित रूप से, इन प्रयासों का उद्देश्य परिवारों को राहत देना, व्यवसायों को अधिक निश्चितता प्रदान करना और करदाताओं के लिए एक ऐसी प्रणाली सुनिश्चित करना है जिसमें वे बिना किसी अनावश्यक कठिनाई के अपने दायित्वों का निर्वहन कर सकें। राज्य इस पूरी यात्रा में बराबर के साझेदार रहे हैं। वे परिषद में अपनी प्राथमिकताओं और अनुभवों को लेकर आए, निर्णयों को आकार देने में सहयोग किया और उनके क्रियान्वयन का दायित्व संभाला। जीएसटी की प्रगति प्रत्येक सरकार के उत्तरदायित्वों का सम्मान करते हुए एक साझा राष्ट्रीय लक्ष्य की दिशा में आगे बढ़ने की इसी तत्परता पर टिकी है। इसके परिणाम विश्वास को सुदृढ़ करते हैं। 'विकसित भारत' बनने के भारत के संकल्प के लिए एक ऐसी अर्थव्यवस्था की आवश्यकता है, जिसमें हर स्तर और आकार के उद्यम फल-फूल सकें, चाहे उनकी शुरुआत कहीं से भी हुई हो। पिछले बारह वर्षों में सरकार ने इन अनुकूल परिस्थितियों के निर्माण के लिए निरंतर कार्य किया है। कर वापसी (रिफंड) भी उतनी ही प्रासंगिक है।
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जीएसटी संग्रह में उल्लेखनीय इजाफा, अर्थव्यवस्था की सुदृढ़ता बढ़ी
6 अक्टूबर 2026 को 12:44 am बजे

जीएसटी संग्रह में उल्लेखनीय इजाफा, अर्थव्यवस्था की सुदृढ़ता बढ़ी
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