किशनगंज-शाहाबाद के सहरिया अंचल में कई बच्चे ऐसे सवालों के बीच जी रहे हैं, जिनके जवाब शायद उन्हें कभी न मिलें। किसी ने पिता को खो दिया तो किसी के सिर से मां का साया उठ गया। कोई बुजुर्ग दादा-दादी की छांव में पल रहा है तो किसी की बड़ी बहन ने छोटे भाई-बहनों के लिए अपना घर तक छोड़ दिया। ये वे बच्चे हैं जिनके बचपन की डोर अनिश्चितता के हाथों में है। राज और उसकी 14 वर्षीय बहन सोमबाई की कहानी रिश्तों की मजबूती और त्याग की मिसाल है। पिता की मृत्यु के बाद दोनों बच्चों की जिम्मेदारी बड़ी बहन शकुंतला ने संभाली। शकुंतला विवाहित है और उसका ससुराल पाटन गांव में है, लेकिन छोटे भाई-बहनों को अकेला छोड़ना उसे मंजूर नहीं था। वह अपना ससुराल छोड़कर दोनों के साथ रहने लगी। जिस उम्र में उसे अपना वैवाहिक जीवन संवारना था, उस उम्र में वह भाई-बहनों का भविष्य संवारने में जुट गई। यह त्याग उन बच्चों के लिए किसी वरदान से कम नहीं है, जिनके पास खोने को कुछ और नहीं बचा था। शाहाबाद की सहरिया बस्ती में 12 वर्षीय सरस्वती भी अपने दादा-दादी के सहारे जी रही है। उसके पिता की मौत के बाद मां दूसरी जगह चली गई। अब दोनों बच्चों की जिम्मेदारी करीब 70 वर्ष के दादा-दादी पर आ गई है। उम्र और बीमारी के बावजूद बुजुर्ग दोनों बच्चों को अकेला नहीं छोड़ रहे। बच्चों के लिए अब यही दादा-दादी उनके मां-बाप हैं। घर की छोटी-बड़ी जरूरतों के बीच बुजुर्गों की अपनी परेशानियां पीछे छूट गई हैं। वे अपनी क्षमता के अनुसार बच्चों की जरूरतें पूरी करने और उनकी पढ़ाई जारी रखने की कोशिश करते हैं। यह समर्पण उन बच्चों के जीवन में उम्मीद की किरण जगाता है, जिनके पास शायद कोई और सहारा नहीं है। प्रियंका के दादा की उंगली थामे 10 साल की यह बच्ची जब चलती है तो उसके साथ उसकी उम्र से कहीं बड़ा दर्द भी चलता है। पिता को खोने के बाद मां भी उससे दूर हो गई। अब उसके जीवन में अगर कोई अपना है तो वह 65 वर्षीय दादा हैं। प्रियंका के लिए वही मां हैं, वही पिता और वही पूरा परिवार। करीब चार साल पहले पत्थर की खान में डूबने से प्रियंका के पिता की मौत हो गई थी। परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा। पिता की मौत के करीब एक महीने बाद मां ने भी दूसरी जगह विवाह कर लिया। मां के जाने के बाद प्रियंका दादा के पास रह गई। उम्र के इस पड़ाव पर जब दादा को खुद सहारे की जरूरत है, वे पोती की जिम्मेदारी उठा रहे हैं। यह कहानी उन अनगिनत बच्चों की है जो परिस्थितियों के शिकार हो जाते हैं। इन बच्चों की सबसे बड़ी चिंता केवल परिवार का बिखरना नहीं है, बल्कि बचपन का धीरे-धीरे हाथ से निकल जाना है। जिस उम्र में हाथों में किताब, कॉपी और खिलौने होने चाहिए, उसी उम्र में कई बच्चे घर की जिम्मेदारियों और मजदूरी में उलझ जाते हैं। परिवार में कमाने वाला नहीं होने पर दो वक्त की जरूरतें पूरी करना प्राथमिकता बन जाती है। ऐसे में पढ़ाई पीछे छूटने लगती है। बच्चे परिस्थितियों से लड़ते हुए समय से पहले बड़े होने लगते हैं। यह बचपन का खो जाना उन बच्चों के लिए सबसे बड़ा अभिशाप है, जिन्हें खेलने-कूदने और पढ़ने की उम्र में जिम्मेदारियों का बोझ उठाना पड़ता है। आदिवासी अंचल में नाता प्रथा से जुड़ी परिस्थितियों में भी कई बार बच्चों का भविष्य प्रभावित होता है। पिता की मौत के बाद मां दूसरी जगह विवाह कर ले तो बच्चे पीछे छूट जाते हैं। कोई दादा-दादी या रिश्तेदार संभाल ले तो जिंदगी किसी तरह आगे बढ़ती है, लेकिन सहारा नहीं मिलने पर बच्चों के सामने भोजन, रहने और शिक्षा तक का संकट खड़ा हो जाता है। इस घटना ने परिवार पर दुखों का पहाड़ ला दिया।
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पालनहार योजना: अनाथ बच्चों के जीवन में उम्मीद की किरण
6 अक्टूबर 2026 को 12:44 am बजे

पालनहार योजना: अनाथ बच्चों के जीवन में उम्मीद की किरण
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